4 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दुनिया के मानचित्र को देखने के तरीके से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव को मंजूरी दी। “Correct the Map” नामक इस प्रस्ताव का उद्देश्य ऐसे विश्व मानचित्रों के उपयोग को बढ़ावा देना है, जो महाद्वीपों और देशों के वास्तविक क्षेत्रफल को अधिक सही अनुपात में दिखाते हैं।
टोगो ने अफ्रीकी देशों की ओर से यह प्रस्ताव पेश किया था। भारत सहित 164 देशों ने इसके पक्ष में मतदान किया। अमेरिका एकमात्र देश था जिसने विरोध में वोट दिया। एस्टोनिया, जॉर्जिया, लिथुआनिया, मोल्दोवा, सर्बिया और यूक्रेन मतदान से दूर रहे।
प्रस्ताव में खास तौर पर Equal Earth Projection जैसे equal-area maps के उपयोग को बढ़ावा देने की बात कही गई है। इसका उद्देश्य सदियों से प्रचलित Mercator Projection से पैदा होने वाली क्षेत्रफल संबंधी विकृतियों को कम करना है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है। संयुक्त राष्ट्र ने Mercator map पर प्रतिबंध नहीं लगाया है। सरकारों, स्कूलों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और तकनीकी कंपनियों को ऐसे मानचित्र अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया है, जिनमें देशों और महाद्वीपों के क्षेत्रफल का अनुपात अधिक सही दिखाई देता है।
अमेरिका ने प्रस्ताव का विरोध क्यों किया?
अमेरिका का विरोध मानचित्र की गणितीय तकनीक से अधिक प्रस्ताव के राजनीतिक और वैचारिक पहलू पर केंद्रित रहा।
अमेरिकी प्रतिनिधि ने इस पहल को एक व्यापक “radical ideological project” का हिस्सा बताया। अमेरिका का तर्क था कि संयुक्त राष्ट्र को अंतरराष्ट्रीय शांति, समृद्धि और देशों के बीच संबंधों जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
दूसरी ओर, प्रस्ताव का समर्थन करने वाले अफ्रीकी देशों का तर्क है कि विश्व मानचित्र केवल भूगोल समझने का साधन नहीं है। नक्शे लोगों के मन में देशों, महाद्वीपों और उनकी वैश्विक स्थिति की तस्वीर भी बनाते हैं।
यही कारण है कि यह बहस केवल cartography तक सीमित नहीं रही। यह प्रतिनिधित्व, इतिहास और दुनिया को देखने के नजरिए से भी जुड़ गई है।
Mercator Map में क्या समस्या है?
Gerardus Mercator ने 1569 में Mercator Projection विकसित किया था। इसका मुख्य लाभ समुद्री navigation में था। यह दिशाओं और कोणों को इस तरह दिखाता है कि नाविकों के लिए मार्ग तय करना आसान हो जाता है।
समस्या तब पैदा होती है जब इसी projection का इस्तेमाल देशों और महाद्वीपों के आकार की तुलना के लिए किया जाता है।
पृथ्वी गोलाकार है। जब इसकी सतह को एक सपाट 2D map पर दिखाया जाता है, तो किसी न किसी तत्व में distortion आना तय है।
Mercator Projection में भूमध्य रेखा से दूर जाते हुए क्षेत्रों का आकार तेजी से बड़ा दिखाई देने लगता है। इसी कारण Greenland, Canada और Russia जैसे उत्तरी क्षेत्र वास्तविक अनुपात की तुलना में बहुत बड़े दिखते हैं।
Africa और भूमध्य रेखा के आसपास मौजूद दूसरे क्षेत्र इसके मुकाबले छोटे नजर आते हैं।
सबसे प्रसिद्ध उदाहरण Greenland और Africa का है। Mercator map पर दोनों का आकार कई बार लगभग समान दिखाई देता है, जबकि वास्तविक क्षेत्रफल में Africa लगभग 14 गुना बड़ा है।
इसी असमानता ने Mercator Projection को लेकर दशकों से चली आ रही बहस को मजबूत किया है।
Africa का वास्तविक आकार कितना बड़ा है?
Africa लगभग 30.3 million square kilometres में फैला है और दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा महाद्वीप है।
इसके आकार को समझने का एक आसान तरीका तुलना है। United States, China, India, Japan और Mexico को Africa के भीतर रखा जाए, तो भी काफी क्षेत्र बचता है।
लेकिन Mercator map देखने पर Africa की यह विशालता सहज रूप से दिखाई नहीं देती।
“Correct the Map” अभियान से जुड़े लोगों का मानना है कि जब बच्चों, छात्रों और आम लोगों को दशकों तक ऐसा world map दिखाया जाता है, जिसमें कुछ क्षेत्र वास्तविक अनुपात से बहुत बड़े और दूसरे बहुत छोटे दिखते हैं, तो इसका प्रभाव दुनिया की भौगोलिक समझ पर भी पड़ सकता है।
Equal Earth Projection क्या है?
Equal Earth Projection को 2018 में cartographers Bojan Šavrič, Tom Patterson और Bernhard Jenny ने विकसित किया था।
यह Robinson Projection से प्रेरित है, लेकिन इसकी एक महत्वपूर्ण विशेषता इसे अलग बनाती है। Equal Earth एक equal-area projection है।
इसका अर्थ है कि अलग अलग देशों और क्षेत्रों के क्षेत्रफल का आपसी अनुपात map पर सुरक्षित रहता है। Africa का क्षेत्रफल Greenland की तुलना में जितना बड़ा है, map पर भी उस अनुपात को बनाए रखने का प्रयास किया जाता है।
इससे दुनिया के landmasses के वास्तविक relative size को समझना आसान होता है।
हालांकि Equal Earth Projection भी पूरी तरह distortion-free नहीं है। कोई भी flat world map पृथ्वी के area, shape, distance और direction को एक साथ पूरी तरह सही नहीं दिखा सकता।
Equal Earth area को प्राथमिकता देता है। इस प्रक्रिया में कुछ स्थानों की shape, distance और angles में distortion हो सकता है।
इसलिए इसे हर तरह के mapping work के लिए Mercator का पूर्ण विकल्प मानना भी सही नहीं होगा।
मानचित्रों का इतिहास सत्ता और ज्ञान से भी जुड़ा रहा है
मानचित्र केवल रास्ता खोजने के उपकरण नहीं रहे हैं। मानव इतिहास में उनका इस्तेमाल व्यापार, समुद्री यात्रा, सीमाओं, प्रशासन और राजनीतिक प्रभाव के लिए भी होता रहा है।
प्राचीन सभ्यताओं ने अपने आसपास की दुनिया को समझने के लिए शुरुआती नक्शे बनाए। दूसरी शताब्दी में Ptolemy के भूगोल संबंधी कार्य ने latitude और longitude आधारित mapping को आगे बढ़ाया।
समुद्री यात्राओं के विस्तार के साथ maps की उपयोगिता और बढ़ी। 16वीं शताब्दी में Mercator Projection ने navigation में बड़ी भूमिका निभाई।
अब डिजिटल maps, satellite imagery और geographic information systems ने cartography को काफी आगे पहुंचा दिया है। इसके बाद भी classroom और general-purpose world maps में projection का चुनाव आज भी महत्वपूर्ण है।
भारत ने Equal Earth प्रस्ताव का समर्थन किया
भारत उन 164 देशों में शामिल था जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया।
भारत जैसे देश के लिए यह विषय भौगोलिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। Mercator Projection में भूमध्य रेखा के आसपास और उससे अपेक्षाकृत नजदीक स्थित क्षेत्रों का क्षेत्रफल उत्तरी अक्षांशों के मुकाबले छोटा दिखाई देता है।
Equal-area projections इस अंतर को कम करते हैं और देशों तथा महाद्वीपों के relative area को बेहतर अनुपात में प्रस्तुत करते हैं।
क्या अब दुनिया के सभी नक्शे बदल जाएंगे?
नहीं।
संयुक्त राष्ट्र महासभा का यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। किसी देश, स्कूल, publisher या technology company को तुरंत Mercator Projection छोड़ना जरूरी नहीं है।
Mercator Projection का उपयोग navigation और कुछ digital mapping applications में आगे भी हो सकता है।
UN resolution मुख्य रूप से उन परिस्थितियों में equal-area projections के उपयोग को बढ़ावा देता है, जहां देशों और महाद्वीपों के आकार की तुलना महत्वपूर्ण होती है।
इसलिए बदलाव धीरे धीरे education, media, international organisations और digital platforms में दिखाई दे सकता है।
यह केवल नक्शे की बहस नहीं है
4 सितंबर 2026 का UN vote cartography से आगे जाने वाली बहस को सामने लाता है।
एक पक्ष इसे वैज्ञानिक रूप से अधिक संतुलित geographical representation की दिशा में उठाया गया कदम मानता है। समर्थकों के लिए यह Africa और दूसरे क्षेत्रों को उनके वास्तविक भौगोलिक अनुपात में दिखाने से जुड़ा विषय भी है।
दूसरा पक्ष इसे संयुक्त राष्ट्र के मूल काम से दूर जाने वाली वैचारिक पहल मानता है। अमेरिका का विरोध इसी तर्क पर आधारित था।
दोनों दृष्टिकोणों के बीच एक तथ्य महत्वपूर्ण है। पृथ्वी को किसी सपाट world map पर बिना किसी distortion के नहीं दिखाया जा सकता।
इसलिए असली प्रश्न केवल यह नहीं है कि कौन सा map सही है। प्रश्न यह भी है कि map किस उद्देश्य के लिए बनाया जा रहा है और उसमें किस प्रकार की accuracy को प्राथमिकता दी जा रही है।
Equal Earth Projection की बढ़ती स्वीकार्यता इसी बहस को नई दिशा देती है।
लेखक परिचय
आमोद कुमार पांडेय ग्रेटर नोएडा निवासी हैं। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों, वैश्विक राजनीति और समसामयिक विषयों में उनकी विशेष रुचि है। वे जनहित और राष्ट्रीय महत्व से जुड़े विषयों पर तथ्य आधारित लेखन करते हैं।
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